एक दशक पहले की है यह बात
१४ दिसम्बर की थी वोह सर्द रात
नम आँखों से देखि थी मैंने उसकी पहली झलक
मेरे हाथो में थी मेरी पलक
मिली उस दिन थी मुझे पहचान नई
विस्मित मन में भर गयी भावनाए कई
दर्द सहना उस दिन था मैंने जाना
डर को इतने करीब से पहचाना
उस नन्हें से तोते में बस गयी मेरी जान
वोह छोटी सी सूरत बन गयी मेरी पहचान
कितना अनूठा है ममता का यह नाता उस दिन से मैंने जाना
ऐसा निस्वार्थ प्रेम और किसि रिश्ते में कहा आ पाता
मन को उस दिन से हर पल रहने लगा यह बोध
मुझ पर निर्भित है वोह अबोध
मुझे ही बनना है उसका रक्षक
मैं ही होंगी उसकी पथप्रदर्शक
मुझे ही वोह देखेगी मुझ से ही सीखेगी
मेरी छाया मुझ जैसी ही बोलेगी
काँप गयी सोच के, की मैं होंगी उसकी उदहारण
करने लगी खुद में बदलाव मैं उस कारण
अच्छि माँ बन पायी या नहीं, जानती नहीं मैं
पर पहले से बेहतर इंसान जरूर बन गयी मैं उस परी के कारण
१४ दिसम्बर की थी वोह सर्द रात
नम आँखों से देखि थी मैंने उसकी पहली झलक
मेरे हाथो में थी मेरी पलक
मिली उस दिन थी मुझे पहचान नई
विस्मित मन में भर गयी भावनाए कई
दर्द सहना उस दिन था मैंने जाना
डर को इतने करीब से पहचाना
उस नन्हें से तोते में बस गयी मेरी जान
वोह छोटी सी सूरत बन गयी मेरी पहचान
कितना अनूठा है ममता का यह नाता उस दिन से मैंने जाना
ऐसा निस्वार्थ प्रेम और किसि रिश्ते में कहा आ पाता
मन को उस दिन से हर पल रहने लगा यह बोध
मुझ पर निर्भित है वोह अबोध
मुझे ही बनना है उसका रक्षक
मैं ही होंगी उसकी पथप्रदर्शक
मुझे ही वोह देखेगी मुझ से ही सीखेगी
मेरी छाया मुझ जैसी ही बोलेगी
काँप गयी सोच के, की मैं होंगी उसकी उदहारण
करने लगी खुद में बदलाव मैं उस कारण
अच्छि माँ बन पायी या नहीं, जानती नहीं मैं
पर पहले से बेहतर इंसान जरूर बन गयी मैं उस परी के कारण
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