Monday, November 5, 2012

Turning 32


देखा  जो  आज ,पहला  सफ़ेद  बाल 
मन  में  आया  येही  एक  ख्याल 
क्या  सच  मुच   बीत  गए  है  इतने  साल

फिर  क्यों   लगती  है  मुझे 
कल  की  है  जैसे  यह  बात 
लिया  था  मैंने  अपना  पहला  कदम 
पापा  का  थामके  हात


वोह  स्कूल  कॉलेज  की  भागा  दौड़ी
वोह  सखियों  के  संग  हसी  ठिठोली  
क्या  दास्ता  है  सब  पिछले  जनम  की

बाबुल  की  लेके  दुआए 
चली  थी  पिया  के  साथ 
आशओं  और  उमीदो  को  पलकों  में  सजाए 
लिए  थे  फेरे  साथ

मन   में  हुई  एक  कम्पन
जीवन  का  अपने  जब  किया  मंथन 
वक़्त  कितना  कर  दिया  जाया 
छोटी  बातो  पे  रोके  मैंने  क्या  पाया

आज  खोली  जब  जीवन  की  बही 
बनाई   फेहरिस्त  चीजो  की  जो  की   नहीं
बात  मन  में  है  यह  आई
जीयो   अब  ऐसे  पछतावा  रहे    कोई  

आज  फिर  है  यह  ठानी 
करू  सार्थक  कहावत  वोह  पुरानी
करू  कुछ  ऐसा  की  
जाऊ  जब  में  यह  जाहा  छोडके 
मुस्कराओ   मैं   रोये  लोग  जग  भरके 

sister in law


डरती जिससे हर भौजाई
घडी है वोह आई
पधार  रही है  ननद
 संग लिए नंदोई

घर पे मेरे होगा उसका राज
मीन ,मेख निकलेगे अब हर काज
जीजी बाई कहते थकेगी नहीं मियाजी की जुबान
अपने ही घर में कहलौंगी में मेहमान

कितने दिन से कर रही हु तयारी
चमक रही है घर की हर गलियारी
बेल बेल के दुःख गए है हाथ
बड़ी पापड़ बांधने  जो है साथ

कमर ली है मैंने क़स
नहीं सुनने है ताने बस
 मन में है आस
ननद बाई  जाए
 इस बार हस हस

a thought


माता पिता के त्याग की गाथा गाता जहान
जिजामाता ने बनाया शिवाजी को महान
श्रवण जैसा बेटा चाहे हर पिता
पर प्रह्लाद की बोलो क्या थी खता 

पुराणों में भी है उल्लेक
बच्चो ने  निभाए कर्त्तव्य अनेक  
दो वचनों के लिए वन गए रघुराई
भीषण प्रतिज्ञा देवरत ने उठाई
  
त्याग दोनों ने किये महान
पर राम से बड़ी रघुकुल की शान
और महाभारत के संग्राम से कोई नहीं है अन्जान

क्या है आखिर वोह तर्क
क्यों दोनों के अंजाम में है फर्क
दोनों ने ही तो मानी थी पिता की बात
फिर क्यों हुआ एक सही और एक गलत

धर्म से दशरथ थे विवश
और शांतनु थे काम के वश
नियत का था फर्क
येही है पुराणों का अर्क

मेरी तो  इतनी सी  है अर्ज
सोचो समझो फिर निभाओ फर्ज
गलत का मत लो पक्ष
फिर चाहे माता पिता  ही क्यों हो विपक्ष