Wednesday, October 2, 2019

बेटी की बिदाई -- माँ के मन की उधेडबुन

कर्त्तव्य यह बड़ा कैसे निभाऊ  मैं
कन्या का अपने दान कैसे कर आऊ मैं

नित नए प्यंजन  जिसके लिए रोज बनाऊ मैं
सब्जी कम देख, आज आचार रोटी खाने का मन है मेरा
 ये कहना  कैसे उसे  सिखलाऊ मैं
कर्त्तव्य यह बड़ा कैसे निभाऊ  मैं

अवल आने का सबक  जिसको  हमेशा सिखला ऊ मैं 
 कभी पति कभी बच्चो  के लिए कदम पीछे लेने में नहीं कोई बुराई
कैसे उसे अब यह  बतलाऊ  में
कन्या का  अपने दान कैसे कर आऊ मैं

सालो तक घंटे जिसकी बाते सुनने मे  बिताऊ मैं
फ़ोन उसे करने से पहले सही समय देखना होगा
यह सोच सिहर जाऊ  में
कर्त्तव्य यह बड़ा कैसे निभाऊ  मैं

आत्मनिर्भर बीटिया है मेरी, नहीं करने होंगे उसे समझौते
यह खुद को समझाऊ मैं
फिर भी न जाने क्यों , मंदिरो में मन्नते  मांगती जाऊ में
कन्या का अपने दान कैसे कर आऊ  मैं 

सुबक सुबक के माँ मेरी थी  रोती
हर किसी की बिदाई में माँ दुखी तू क्यों होती
यह कह ममता का उसके मजाक  उड़ाया था कभी
अब यह सोच पछताओ मैं
भावना को उसकी अब समझ पाऊ  मैं

कर्त्तव्य यह बड़ा कैसे निभाऊ  मैं
कन्या का अपने दान कैसे कर आऊ  मैं

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