समाज पर पड़ रही है भारी
आज की उच्च शिक्षित नारी
आचल में दूध और आख में पानी
अब नहीं रही उसकी येही कहानी
परमेश्वर नहीं है अब भरतारपर है प्यारा साझीदार
बच्चे है उसकी जान
पर नहीं उसकी केवल पहचान
अब नहीं सहती वोह
अब नहीं चुप रहती वोह
हर काम में है उसकी भागीदारी
घर को जोड़े रखना
अब नहीं सिर्फ उसकी जिम्मेदारी
घर का आँगन ही
अब नहीं उसका जहान
खुले आसमान में भी
भरनी है उसे उडान
ज्ञान की पकडे डोर
चली वोह प्रगति की ओर
थाम घर बाहर दोनों नावो की पतवार
आगे बड़ रही है आज की सुशिक्षित नार
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